शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

ज़िन्दगी कुछ नयी सी लगी.........

ज़िन्दगी कुछ नयी सी लगी,

खुद से अजनबी सी लगी,

हर तरफ शोर ही शोर था,

ख़ामोशी अनसुनी सी लगी,

चिराग-e-दिल में अँधेरा ही अँधेरा,

रोशनी बेवजह सी लगी,

खुद बा खुद झुक गया दर पे सर,

हसरते बंदगी सी लगी,

दास्ताँ-इ-जफा जो भी रूबरू,

हर कहानी सुनी सी लगी।

सांसो की सरगम उखड़ी यूँ,

मौत भी सुरमई सी लगी,

मेरे इस सफ़र-इ- बेक़रार की मंजिल कहाँ है....

मेरे इस सफ़र-ए-बेक़रार की मंजिल कहाँ है?
ऐ यार बता आजकल मेरा दिल कहाँ है?
क्यों तनहाइयाँ इस कदर तनहा हो गई है,
मेरी रंगों भरी वो खुशनुमा महफ़िल कहाँ है?
एक कसक सी जगी रहती है इस दिल में क्यों,
बता ऐ चारागर इस मर्ज़ का हासिल कहाँ है?
हर सुबह आती है आँखों me एक तलाश लिए,
क्या कहुँ इन नजरो का मुकामिल कहाँ है ?
क्यों खो गयी है जिस्म में ही रूह कहीं,
कोई बताए इस सवाल का अब हल कहाँ है....