मेरे इस सफ़र-ए-बेक़रार की मंजिल कहाँ है?
ऐ यार बता आजकल मेरा दिल कहाँ है?
क्यों तनहाइयाँ इस कदर तनहा हो गई है,
मेरी रंगों भरी वो खुशनुमा महफ़िल कहाँ है?
एक कसक सी जगी रहती है इस दिल में क्यों,
बता ऐ चारागर इस मर्ज़ का हासिल कहाँ है?
हर सुबह आती है आँखों me एक तलाश लिए,
क्या कहुँ इन नजरो का मुकामिल कहाँ है ?
क्यों खो गयी है जिस्म में ही रूह कहीं,
कोई बताए इस सवाल का अब हल कहाँ है....
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