शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

ज़िन्दगी कुछ नयी सी लगी.........

ज़िन्दगी कुछ नयी सी लगी,

खुद से अजनबी सी लगी,

हर तरफ शोर ही शोर था,

ख़ामोशी अनसुनी सी लगी,

चिराग-e-दिल में अँधेरा ही अँधेरा,

रोशनी बेवजह सी लगी,

खुद बा खुद झुक गया दर पे सर,

हसरते बंदगी सी लगी,

दास्ताँ-इ-जफा जो भी रूबरू,

हर कहानी सुनी सी लगी।

सांसो की सरगम उखड़ी यूँ,

मौत भी सुरमई सी लगी,

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